आँखों में पलता कोई ख़्वाब रहा,
अंधेरों से लड़ने को बेताब रहा।
अंधेरी थी राहें, थीं उलझन भरी,
दीप बनके हवाओं से लड़ता रहा।
ज़माने ने कोशिश तो की लाख मगर,
वो अपनी ही लौ में मचलता रहा।
न हारा कभी वो न हिम्मत डिगी,
वो काँटों की राहों पर चलता रहा।
जो कहते थे कल कि बुझ जाएगा,
वो तूफानों के बीच भी जलता रहा।
उसे रोकने की हर एक चाल को,
वो अपनी ही ताकत में बदलता रहा।
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