संस्कृत की सरिता से निकली, प्राकृत के आँगन में आई,
अपभ्रंश की राह से चलकर, जन-जन की वाणी कहलायी।
लोक-स्वरों की खुशबू लेकर, इसने अपना रूप सजाया,
अमीर खुसरो की हिंदवी ने, इसमें नई मिठास मिलाई।
कबीर की साखी ने जग को, सच का अर्थ बताया,
सूरदास ने भक्ति सजाई, मीरा ने प्रेम सुनाया।
रामचरित की सहज कथा को, तुलसी घर-घर लाए,
जनभाषा में राम बसे तो, सबने अपना राम पाया।
भारतेन्दु ने दीप जलाकर, नव हिन्दी को राह दिखाई,
प्रेमचंद ने खेत-गली की, सच्ची पीड़ा सामने लाई।
महादेवी की करुणा जागी, दिनकर का स्वर गूँजा,
बच्चन की मधुशाला ने भी, जन-मन में जगह बनाई।
आजादी के कठिन दिनों में, हिन्दी बनी पुकार,
नारों में वह गूँज उठी तो, जागा देश अपार।
पत्रों और अखबारों ने फिर, घर-घर अलख जगाई,
सरल शब्द की शक्ति बनी थी, जन-जन का हथियार।
रेडियो ने गाँव-शहर तक, इसकी धुन पहुँचाई,
सिनेमा के गीतों से फिर, हिन्दी दुनिया भर में छाई।
एक बच्चन की ‘मधुशाला’, दूजे की दमदार जुबानी,
मंच, परदे, विज्ञापन तक, हिन्दी की धाक जमाई।
परदेसों में बसे जनों ने, इससे नाता जोड़ा,
हिन्दी ने हर दूर देश में, अपना दीप न छोड़ा।
ब्लॉग, संदेश और पॉडकास्ट, नए द्वार खुलवाते,
मोबाइल ने सात समंदर का, पल में अंतर तोड़ा।
अब रीलों से एआई तक, हिन्दी नए रंग दिखाती,
हँसती, गाती, सीखती भाषा, हर दिन आगे जाती।
रूप बदलकर भी यह अपनी, जड़ों से नाता रखती है,
हिन्दी भारत की धड़कन है, भारत की पहचान बताती॥
— संतोष कुमार शर्मा
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