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नाम उसका कहीं आ सका ही नहीं

                
                                                         
                            नाम उसका कहीं आ सका ही नहीं
                                                                 
                            
मेरा बचपन था वो फिर मिला ही नहीं
उसकी यादें कभी दिल में चुभती तो हैं
उसके बारे में पर कुछ कहा ही नहीं
याद आते हैं उसके लिबास और वो
कुछ अदाएं जिन्हें भूलता ही नहीं
आज उसका तसव्वुर हुआ मुझको क्यों
आज उसका ख़्याल ख़ुदा ही नहीं
और भी है बहुत कुछ जो परदे में है
और पर्दा वो मुझसे उठा ही नहीं
उसका चेहरा खिले फूल जैसा था कुछ
ग़ौर कांटों पे मैं ने किया ही नहीं
प्यार क्या है समझता ही था मैं न तब
दरम्यां कुछ मेरे उसके था ही नहीं
ज़िन्दगी को समझने में उम्रें लगीं
और वो, कुछ अब उसका पता ही नहीं
तुमको शायर था बनना, बने ख़ाक 'रंग'
हाथ में रहके कुछ भी रुका ही नहीं
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2 महीने पहले

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