क्या कुछ उसने और बात की
मुझको भूली नहीं रात की
तुमने भी कुछ गीत सुनाए
मैं ने ग़ज़लों की बरसात की
सब मौसम आते जाते हैं
क़द्र कीजिए कुछ जज़्बात की
लेकिन वही कहानी है ये
वहीं शक्ल है कायनात की
कोई मुझको कुछ भी कह ले
अभी फ़िक्र है कुछ हालात की
मैं भी यूं तो ज़माना ही हूँ
वक़्त ने वक़्त के संग बारात की
मैं इक गुमनामी की कहानी
रोटी तोड़ता हूँ खैरात की
तू भी मेरे साथ ही चल ना
उनकी, उनके ख़्यालात की
'कव्य' का हूँ अहसानमंद मैं
'रंग' ने जो कुछ करामात की
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X