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वक़्त मुसलसल चलता है

                
                                                         
                            वक़्त मुसलसल चलता है
                                                                 
                            
कितने फ़लक बदलता है
मैं इस घर में रहता हूं
ये हर वक़्त जो जलता है
किसी की प्यास बुझानी थी
पत्थर कोई पिघलता है
आंसू - आंसू कोई ग़म
हंसते हुए निकलता है
वो सूरज फिर उगा नहीं
ये सूरज भी ढलता है
जाने किस उम्मीद में दिल
धड़कन से न संभलता है
मेरी क़लम रुक जाती है
घर से 'रंग' निकलता है
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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