यादें कहती रहती हैं कुछ
बुरी भी हैं अच्छी भी हैं कुछ
आज हमें जो जीना ही है
ये मरने के तौर ही हैं कुछ
आसमान ये बरसता रिमझिम
उसकी आंखें जैसी हैं कुछ
मैं उम्मीद नहीं हारा हूं
इसमें ग़लतियां यक़ीं की हैं कुछ
कोई काम की बात नहीं है
ख़ामोशियां ये बोली हैं कुछ
घर में सफ़र, सफ़र में दुनिया
ग़लत फ़हमियां होती हैं कुछ
तुम अपनी आवाज़ में कहो
हम अपनी ख़ामोशी हैं कुछ
किसी दर्द को चैन आ गया
कोई चोटें लिख दी हैं कुछ
- मृदुल
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