आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

भ्रूण से सम्मान तक

                
                                                         
                            मत मारो माँ मुझे कोख में, मैं भी बड़ी हो जाऊँगी,
                                                                 
                            
छोटी सी चिंगारी से ज्वाला मैं बन जाऊँगी।
चलते-चलते जो राहों में, मैं गिरकर रोने लग जाऊँगी,
मत उठाना तुम मुझे माँ, मैं रोते-रोते चुप हो जाऊँगी।
मत दिलाना नए खिलौने और कपड़े,माँ दिला देना शिक्षा के नए सपने,
ब्याह में मत बेचना वो भूमि का खंड, दिला देना माँ मुझे शिक्षा का अवसर।
शिक्षा से मुझे ज्ञान मिलेगा, मान मिलेगा, सम्मान मिलेगा,मेरी गरिमापूर्ण जीवन का, यही तो असली आधार बनेगा।
एक न एक दिन मैं भी माँ बनूँगी, बस इतना फर्क तुझमें और मुझमें होगा,
तूने बेटे की चाह में भ्रूण जाँच कराई,
मैं हर बेटी की सुरक्षा की आवाज़ बनूँगी।
-ज्योति मणि
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर