फिर पहचान कहाँ ठहरे?
दीवार पर सागर की तस्वीर,
नीला रंग दिखाती है।
बाहर लहर किनारा छूकर,
उसका होना जताती है।
पर्वत केवल ऊँचाई होता,
तो पत्थर का ढेर ही रहता।
उसकी बर्फ़ पिघलती है तो,
नीचे सूखा गाँव सँवरता।
बंद कमरे की घुटन में,
खिड़की थोड़ी खोल दी।
हवा दिखी न आँखों को,
पर साँसों की गाँठ खोल दी।
चूल्हे में छोटी-सी लौ थी,
फिर भी रोटी सेंक गई।
आग की पहचान उस आँच में,
जो भूख मिटाकर ठहर गई।
पानी में चेहरा दिखता था,
प्यास मगर अब भी बाक़ी थी।
दो घूँटों के बाद समझ आया,
उसकी निर्मलता कितनी ज़रूरी थी।
इमारतों के बीच दिखा नभ,
छोटा-सा नीला टुकड़ा था।
छत पर पंख खुले चिड़िया के,
आकाश दूर तक फैला था।
सूखी मिट्टी हाथ में लेकर,
बच्चे ने बेकार बताया।
बारिश आई, बीज जगा तो,
उसी जगह अंकुर लहराया।
लहर, श्वास, ऊष्मा, अंकुर—
इनसे जग का रूप सँवरे।
नाम लिखे हों, गुण खो जाएँ,
फिर पहचान कहाँ ठहरे?
- संतोष कुमार शर्मा
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