आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फिर पहचान कहाँ ठहरे?

                
                                                         
                            फिर पहचान कहाँ ठहरे?
                                                                 
                            

दीवार पर सागर की तस्वीर,
नीला रंग दिखाती है।
बाहर लहर किनारा छूकर,
उसका होना जताती है।

पर्वत केवल ऊँचाई होता,
तो पत्थर का ढेर ही रहता।
उसकी बर्फ़ पिघलती है तो,
नीचे सूखा गाँव सँवरता।

बंद कमरे की घुटन में,
खिड़की थोड़ी खोल दी।
हवा दिखी न आँखों को,
पर साँसों की गाँठ खोल दी।

चूल्हे में छोटी-सी लौ थी,
फिर भी रोटी सेंक गई।
आग की पहचान उस आँच में,
जो भूख मिटाकर ठहर गई।

पानी में चेहरा दिखता था,
प्यास मगर अब भी बाक़ी थी।
दो घूँटों के बाद समझ आया,
उसकी निर्मलता कितनी ज़रूरी थी।

इमारतों के बीच दिखा नभ,
छोटा-सा नीला टुकड़ा था।
छत पर पंख खुले चिड़िया के,
आकाश दूर तक फैला था।

सूखी मिट्टी हाथ में लेकर,
बच्चे ने बेकार बताया।
बारिश आई, बीज जगा तो,
उसी जगह अंकुर लहराया।

लहर, श्वास, ऊष्मा, अंकुर—
इनसे जग का रूप सँवरे।
नाम लिखे हों, गुण खो जाएँ,
फिर पहचान कहाँ ठहरे?
- संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
58 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर