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फिर भी ये कैसी कशिश है

                
                                                         
                            मैं नदिया, तू धारा,
                                                                 
                            
मैं कश्ती, तू किनारा।
मैं बादल, तू बारिश,
मैं प्यासा, तू सहारा।
तेरी-मेरी धड़कन एक,
फिर भी मिलने की ख़्वाहिश है।
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

मैं सुर, तू सरगम,
मैं धुन, तू तराना।
मैं काग़ज़, तू स्याही,
मैं ख़त, तू ठिकाना।
दो जिस्म, एक चाहत,
किस्मत की ये साज़िश है।
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

मैं चंदा, तू चाँदनी,
मैं रात, तू सितारा।
मैं सपना अधूरा,
तू सच हुआ हमारा।
दो राहें, एक मंज़िल,
साथ की बस गुज़ारिश है।
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

मैं चुप्पी, तू बातें,
मैं राज़, तू फ़साना।
मैं नींद, तू सपना,
मैं घर, तू ठिकाना।
बिन बोले सब कहना,
आँखों की नुमाइश है।
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

मैं मंज़िल, तू कोशिश,
मैं राह, तू सफ़र।
मैं बंद-सा दरवाज़ा,
तू आने की ख़बर।
तेरी धीमी आहट,
साँसों पर इक बारिश है।
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

मेरा रूठा चेहरा,
तेरा पास बुलाना।
तेरी मीठी अनबन,
मेरा फिर मनाना।
रूठे दो पल केवल,
चाहत की फ़रमाइश है।
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

मैं आँसू, तू मुसकान,
मैं दर्द, तू दवा।
मैं सूखी-सी मिट्टी,
तू सावन की हवा।
तेरा हल्का छूना,
बाकी कैसी रंजिश है!
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

मैं कल, तू मेरा आज,
मैं पल, तू ज़माना।
मैं साँस, तू धड़कन,
मैं घर, तू ठिकाना।
एक उम्र, दो बाँहें,
बस इतनी गुज़ारिश है।
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥

तू दूर, मैं तन्हा,
तू पास, मैं तेरा।
मैं रात की चुप्पी,
तू पहला सवेरा।
एक साथ, फिर दूरी,
प्यार की कैसी बंदिश है!
मैं तुझमें, तू मुझमें अगर,
फिर भी ये कैसी कशिश है॥
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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