वो जन्म नहीं था…
वो जैसे एक ख़ामोशी का जन्म था,
जहाँ रोने की आवाज़ भी
किस्मत ने पहले ही दबा दी थी…
गोद में उठाया—
तो लगा जैसे एक सवाल थाम लिया हो,
न हरकत, न आहट,
बस धड़कनों का एक अधूरा-सा सिलसिला…
माँ की बाँहें भर आईं,
पर उसकी दुनिया खाली रही,
जैसे ममता ने उसे पुकारा तो बहुत,
पर ज़िन्दगी ने जवाब ही नहीं दिया…
हॉस्पिटल की सफ़ेद दीवारों के बीच
मशीनों का एक ठंडा जंगल था,
और उसी जंगल में
एक नन्ही ज़िन्दगी रास्ता भूल गई थी…
मशीनों की बीप के साथ
उसकी धड़कन चलती थी—
और उन्हीं धड़कनों के सहारे
मेरी साँसें भी चलती थीं…
जब उसकी साँस अटकती—
तो लगता मेरी छाती फट जाएगी,
और जब वो थोड़ा संभलता—
तो उम्मीद फिर से ज़िंदा होने की गलती कर बैठती…
दस दिन…
न दिन रहा, न रात,
बस एक पिता बैठा रहा
मशीनों के शोर में
अपने बेटे की धड़कनें गिनता हुआ…
हर बीप—
जैसे दिल पर हथौड़ा पड़ता हो,
हर दौरा—
जैसे ज़िन्दगी को टुकड़ों में तोड़ता हो…
डॉक्टरों की आँखों में
जब उम्मीद बुझती दिखी,
तब समझ आया—
कुछ हारें लड़ी नहीं जातीं,
बस सह ली जाती हैं…
फिर वो दिन आया—
जब उसकी आँखों पर पट्टी रख दी गई,
जैसे दुनिया ने खुद ही
उससे अपना हर रंग वापस ले लिया हो…
दस दिन की ज़िन्दगी—
पर दर्द… उम्र भर का दे गया,
हर पल ऐसा
जैसे दिल को अंदर से चीरा जा रहा हो…
ग्यारहवें दिन—
वो मेरी गोद में था…
इतना पास—
कि उसकी हर साँस मेरे सीने में गूंज रही थी…
और फिर—
वो लंबी… बहुत लंबी साँसें…
जैसे हर साँस में
वो मुझसे लिपटकर जी लेना चाहता हो…
मैं उसे थामे रहा…
और वो धीरे-धीरे छूटता गया…
एक साँस…
फिर दूसरी…
और फिर—
कुछ भी नहीं…
उस पल—
जैसे समय रुक गया,
जैसे दिल ने धड़कना छोड़ दिया,
जैसे दुनिया ने अपनी आवाज़ खो दी…
अब भी…
रात के सन्नाटे में
वो मशीनों की बीप सुनाई देती है,
वही धड़कन… वही आवाज़…
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