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दुर्वासा और अष्टादशभुज हनुमान

                
                                                         
                            दुर्वासा और अष्टादशभुज हनुमान
                                                                 
                            

धूनी जलती, मंत्र जगे थे,
तप का ऊँचा था सम्मान।
सिद्धि मिली, पर शांति न आई,
फिर भी सूने मन और प्राण।

दुर्वासा ने ध्यान लगाया,
पवनपुत्र को पास बुलाया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥

आँखें मूँदी, नाम पुकारा,
रोम-रोम में ज्योति जगी।
हनुमत की गहरी भक्ति से,
मन की हर बेचैनी भागी।

भक्ति ने जब द्वार खुलाया,
दिव्य रूप तब सामने आया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥

आभा चमकी, गगन दमक उठा,
चारों ओर उजास हुआ।
अठारह भुज, दिव्य आयुध,
ऋषि का मन निहाल हुआ।

शक्ति का सागर लहराया,
तेज ने सारा तम भगाया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥

शंख, चक्र, गदा, त्रिशूल,
हर आयुध में तेज जगा।
धनुष, खड्ग, पाश, परशु,
हर हाथ में धर्म जगा।

रक्षा का संदेश सुनाया,
बल का सच्चा अर्थ बताया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥

हल, मुसल, कमल और मुद्गर,
कर्म-शक्ति की पहचान।
शक्ति तभी सुंदर होती,
जब वह रखे दुखी का ध्यान।

हर भुजा ने भेद मिटाया,
सेवा को ही धर्म बताया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥

अहंकार का हिम जब पिघला,
ऋषि ने पाया सच्चा ज्ञान।
जिन सिद्धियों पर गर्व रहा था,
उनसे ऊँचे थे भगवान।

मन से सारा भार हटाया,
दुर्वासा ने शीश झुकाया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥

चंचल मन अब शांत हुआ था,
तप का पूरा अर्थ मिला।
भक्ति बिना जो शक्ति अधूरी,
सेवा से वह दीप खिला।

चरणों में जब ध्यान टिकाया,
मन ने अपना घर फिर पाया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥

जब सामर्थ्य सेवा बन जाए,
जीवन पाता सच्चा मान।
जब अभिमान चरण में झुकता,
मन हो जाता स्वयं महान।

दुर्वासा ने सत्य बताया,
भक्ति ने ही पार लगाया।
अष्टादशभुज रूप दिखाकर,
हनुमत ने विश्वास जगाया॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
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5 घंटे पहले

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