देवसेनापति कार्तिकेय
जब तारकासुर ने शीश उठाया,
तब सारी देवसभा घबराई।
शिव-पुत्र ही उसका अंत करेगा,
तब विधि ने बात सुनाई।
कैलाश का जब मौन टूट गया,
तब शक्ति नई मुस्काई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
शिव के तेज से ज्वाला जागी,
अग्नि उसे लेकर आई।
गंगा की पावन धारा ने,
सरवन तक राह दिखाई।
सरकंडों की शांत गोद में,
बाल-प्रभा फिर लहराई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
छह कृत्तिकाएँ पास चलीं तो,
ममता आँखों में भर आई।
हर माता ने पुत्र पुकारा,
हर मन में फिर खुशियाँ छाईं।
छह माओं का स्नेह समेटा,
छह मुख की छवि पाई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
पार्वती जब सरवन पहुँचीं,
पलकों पर नमी उतर आई।
छह माओं की गोद में देखा,
ममता मन में और समाई।
छह रूपों को गले लगाया,
एक देह बन सामने आई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
पालक माओं के चरणों में,
श्रद्धा सहज ही झुक आई।
माँ पार्वती के संग चले जब,
कैलाश पर खुशियाँ छाईं।
जननी और पालक माओं में,
स्नेह की डोर बँध आई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
अग्नि-जन्म से स्कंद कहाए,
तब कीर्ति दिशाओं में छाई।
छह मुख पाकर षण्मुख कहलाए,
जग में नई पहचान बनाई।
कृत्तिकाओं के स्नेह ने उनको,
कार्तिकेय की संज्ञा दिलाई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
दक्षिण ने मुरुगन कहकर पूजा,
तब भक्ति की ज्योत जलाई।
तमिल धरा के वीर कुमार ने,
उसने जन-जन आस जगाई।
स्कंद, षण्मुख, कार्तिकेय की,
तब एक ही महिमा छाई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
शिव ने जब गहरा ज्ञान दिया,
तब दृष्टि नई खुल पाई।
देवों ने जब अस्त्र सौंपे,
फिर शक्ति भुजाओं में आई।
माता ने जब वेल थमाया,
तब विजय स्वयं चल आई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
मोर सवारी साथ खड़ी थी,
रंगों में वह खूब इतराई।
ऊँचा पद भी शीश न बदले,
मोर ने गहरी सीख सिखाई।
शक्ति पाकर विनम्र रहना,
यह बात हृदय में आई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
देवसेना की डोर सँभाली,
तभी रणभेरी बज आई।
बालक समझा तारकासुर ने,
तभी मृत्यु सामने आई।
वेल चली तो दंभ बिखरा,
तब देवों ने मिल जय गाई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
तन के बल पर तारक ऐंठा,
तब मति उसकी भरमाई।
बालक समझकर हँसा युद्ध में,
तब हार सामने आई।
साहस, ज्ञान और दृढ़ निश्चय,
वही सच्ची शक्ति कहलाई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
केवल जन्म से वीर न बनते,
तब ममता शक्ति बन आई।
गुरु का ज्ञान, पिता का अनुशासन,
वह दृष्टि नई दे पाई।
कर्तव्य से जब साहस जुड़ा,
तब जीत चरण तक आई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
धर्म-रक्षा को उठे कार्तिकेय,
तब दुनिया ने जय गाई।
बल के संग विनम्र हृदय ने,
वीरता अमर बनाई।
संकट में जो धर्म निभाए,
उसने ही विजय कमाई।
छह मुख में छह ज्योति समाई,
कार्तिकेय ने राह दिखाई।
— संतोष कुमार शर्मा
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