न पिज़्ज़ा चाहिए, न बर्गर, मुझे तो बस,
मां के हाथों की चूल्हे की रोटी चाहिए,
जिसमें राख लगी हो, और घी में लिपटी हो,
वो रोटी नहीं जनाब, मेरी माटी की खुशबू है,
जिसके आगे होटल के पकवान भी फीके लगे,
जिसकी महक ने मेरा पुरा बचपन महका दिया,
ये सिर्फ चूल्हे की रोटी ही नहीं साहब बल्कि,
ये मेरी मां के हाथों का जादू है।
-आकांक्षा गुप्ता
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