छोड़ो कंकाल से शरीर की चिंता, कोई तो होगा,
जिसे मैं जैसी हूँ, वैसी ही पसंद आऊंगी।
छोड़ो फिक्र खूबसूरत दिखने की,किसी को तो मेरी सादगी पसंद आएगी।
छोड़ो बेरंग चेहरे की फिक्र, कोई तो होगा,जिसे मेरी मासूमियत पसंद होगी।
छोड़ो चिंता बाहर निकले दांतों की, कोई तो होगा,जो मुझे खुश देखकर ही खुश होगा।
छोड़ो न सारी बातों की फिक्र!
माना हज़ारों कमियां हैं मुझमें—न लंबे बाल हैं, न चमकता चेहरा,न गुलाबी गाल, न होंठ लाल हैं,और न ही आँखें कजरारी हैं।
पर छोड़ो सारी चिंता, वही करो जिससे अपने दिल को ख़ुशी मिले,किसी को पसंद आएं या न आएं, अब खुद को हम बड़े कमाल लगते हैं!
-मधु कुमारी
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