चेतना का नया चक्रव्यूह
कौन हूँ मैं, कहाँ से आया,
किस ओर मुझे फिर जाना है?
यह जीवन केवल श्वासों का क्रम,
या कोई सत्य पुराना है?
इस देह के भीतर कौन है जो,
हर पल मुझसे संवाद करे?
कौन मौन अँधेरों में जागे,
कौन मुझमें रहकर प्रश्न करे?
जन्म मिला तो जग को देखा,
पर स्वयं को देख न पाया हूँ।
जितना सुलझाया जीवन को,
उतना ही उलझता आया हूँ।
उन्हीं अनुत्तरित प्रश्नों के
शाश्वत उत्तर पाने की,
अदम्य मानवीय जिज्ञासा के वशीभूत,
मैं चेतना के द्वार तक जाता हूँ ॥
जीवन का पथ तो पा लिया,
पर मन में प्रश्नों का शोर है।
इस जन्म और उस पार के बीच,
अदृश्य कोई अनजाना छोर है।
उसी अनंत छोर को छूने की,
अदम्य मानवीय जिज्ञासा के वशीभूत,
संसार के इस नए कुरुक्षेत्र में,
मैं फिर से उतर जाता हूँ ॥
जानता हूँ कि इस पथ पर भी,
माया के जाल बहुत घने हैं।
सत्य को ढँकने के लिए यहाँ,
झूठ के असंख्य मुखौटे तने हैं।
उन मुखौटों के पीछे छिपे,
शाश्वत सत्य को जानने की
अदम्य मानवीय जिज्ञासा के वशीभूत,
मैं और भीतर उतरता जाता हूँ ॥
रिश्तों, बंधनों, मोह के पथ पर,
कितने ही भ्रम-जाल मिले।
क्षणभंगुर सुख की मृगतृष्णा में,
कितने मन बेहाल मिले॥
उस मृगतृष्णा के पार छिपे,
शाश्वत प्रेम को पाने की,
अदम्य मानवीय जिज्ञासा के वशीभूत,
मैं अंतर्मन में उतर जाता हूँ॥
जब दुःख के बादल घिर आते,
नयनों में आँसू भर जाते हैं।
संघर्षों के तीखे झोंके,
धैर्य मेरा आज़माते हैं॥
उस पीड़ा में छिपे सत्य से,
अंतर-चेतना जगाने की,
अदम्य मानवीय जिज्ञासा के वशीभूत,
मैं हर पीड़ा को अपनाता हूँ॥
अब जीवन अपनी साँझ पर है,
पर यह अंत नहीं—विस्तार है।
हर विदा के पीछे छिपा हुआ,
किसी नव प्रभात का द्वार है।
उसी अनन्त प्रभात को पाने की,
अदम्य मानवीय जिज्ञासा के वशीभूत,
मैं फिर किसी नए जीवन में,
एक नए सत्य की खोज में उतर जाता हूँ ॥
हर उत्तर ने प्रश्न जगाया,
हर प्रश्न ने पथ नया दिखाया।
सत्य मिला तो इतना जाना—
हर सत्य ने फिर सत्य बुलाया।
न अंत प्रश्नों का होना है,
न खोज कभी थम पाती है।
जब तक चेतन ज्योति जलेगी,
जिज्ञासा जन्मती जाती है॥
— संतोष कुमार शर्मा
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