इन रति राहों पर लोगों को भटकते देखा है
कितनी उम्मीदों पर पानी को फिरते देखा है
ढूंढते रह गए अपना ठिकाना
चेहरा जो दुनिया का बदलते देखा है
ना राह पूछते हैं ना ठिकाना कोई अब
जिस राह पर आकर भटके हैं
उसे ही अपना बनाना है सही अब
मुस्कुराती हर सुबह को गुजरते देखा है
चेहरा जो दुनिया का बदलते देखा है
ना जाने क्यों भटके हुए हैं छिपे चहरे वाले
ना यहां ठहरते हैं ना वहां ठहरते हैं
अपने अल्फाजों से आशिया बना लेते हैं
जहर घोलने वाले
ऐसे ही चेहरों को एक दिन तरसते देखा है
चेहरा जो दुनिया का बदलते देखा है
-अर्ली गीत
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