कितना सुहाना है बूंदो का जमी से मिलन,, डूब गया ये समा मस्तियों में।
फ़िज़ा कब से प्यासी थी,,कुछ रूठी सी कुछ खामोश भी थी,
पहली बूंद के चुंबन से आलिंगन का वो सिलसिला शुरू हुआ कि अब न जमी को ज़माने की फिकर न बूंदों को वजूद का हिसाब।।
हर बूंद ने खुद को मिटा कर बसा लिया मिट्टी की खुशबू में अपना जहां।
चलो, हम भी डूब जाए इस अनकहे प्रेम के दायरे में,
जहाँ हर ओर गुल ही गुल हो,, और हर मंजर गुलजार।।
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