बिन राम अवध भी धाम नहीं
मामा-घर से लौटे भरत,
अवध मिली वीरान।
द्वार-द्वार सन्नाटा था,
मौन हुआ हर गान।
पिता नहीं, प्रिय राम नहीं,
जीवन में विश्राम नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
कैकेयी ने वरदानों की,
जब गाथा दोहराई।
सुनते-सुनते भरत के नयनों,
में ज्वाला भर आई।
माँ थीं, फिर भी पीर रही,
करनी का सम्मान नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
पिता गए मन में लेकर,
पुत्र-विरह की पीर।
राम गए मर्यादा लेकर,
भरत हुए अधीर।
माथे पर मुकुट सजे भी तो,
सिर पर पिता का हाथ नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
चित्रकूट में राम दिखे,
भरत दौड़कर आए।
चरणों से लिपटे ऐसे,
नयन स्वयं भर आए।
अश्रु कह गए मन की कथा,
शब्दों में वह सामर्थ्य नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
राम अडिग थे वचन लिए,
भरत अडिग अनुराग।
एक निभाए पिता-वचन,
एक निभाए त्याग।
पादुकाएँ शीश धरीं,
इससे ऊँचा राज नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
नंदीग्राम में वास किया,
राजमहल से दूर।
भूमि-शयन, संयम-व्रत से,
सुख कर डाले चूर।
राम-विरह ही साधना था,
भोगों का कुछ काम नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
मांडवी ने मौन धरा,
विरह स्वयं स्वीकार।
पति के तप की छाँह तले,
त्याग बना श्रृंगार।
दोनों ने दाम्पत्य तजा,
मन में कोई मलाल नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
पर्वत लेकर नभ चले,
मारुति बलवान।
अनजाना संकट जानकर,
भरत ने साधा बाण।
राम-काज का नाम सुना तो,
स्वयं का फिर कुछ ध्यान नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
दिन गिनते, ऋतु गिनते रहे,
चौदह बरस पहाड़।
पादुकाओं से पूछते,
कब आएँ रघुनाथ।
साँस टिकी बस आस पर,
राम बिना आराम नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
राम अवध जब लौटकर,
भरत के सम्मुख आए।
राज रखा था चरणों में,
चरणों में ही लौटाए।
जिसे जगत अधिकार कहे,
भरत को उसका मान नहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
रामकथा में रण बहुत,
वीरों के आख्यान।
एक विजय मन पर हुई,
भरत बने प्रतिमान।
राम ने रावण जीत लिया,
भरत ने जीता ‘मैं’ कहीं—
राज मिला, पर राम नहीं,
बिन राम अवध भी धाम नहीं॥
— संतोष कुमार शर्मा
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