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बहनें खिड़कियाँ हैं घर की

                
                                                         
                            भाई दीवार, बाप छत, माँ आँगन,
                                                                 
                            
बहनें खिड़कियाँ हैं घर की।
मैं इस आँगन में दीवार के सहारे,
छत की छाँव में बैठकर,
खिड़कियों से हवा खाता हूँ...

पागल हूँ! घूम लेता हूँ—
शहर, पहाड़, खेत, शिवालयों में,
मगर लौट के आख़िर मैं घर को आता हूँ,
खिड़कियों से हवा खाता हूँ...
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एक महीने पहले

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