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बस्ती के लोग

                
                                                         
                            किसी के घर में चूल्हा आज भी जलता नहीं होगा,
                                                                 
                            
किसी बच्चे ने शायद पेट भरकर खाया नहीं होगा।

वो टूटी छत, वो मिट्टी का घर, बरसात का मौसम,
वहाँ बारिश से कोई रात भर सोया नहीं होगा।

जिसे दुनिया ने बस “गरीबों की बस्ती” कह दिया अक्सर,
वहाँ हर शख़्स ने सपनों को यूँ छोड़ा नहीं होगा।

किसी माँ की नज़र दरवाज़े पर अब भी लगी होगी,
मज़दूरी से अभी तक बेटा उसका लौटा नहीं होगा।

वो बच्चे भी तो पढ़ने और बढ़ने का हुनर रखते,
मगर किस्मत ने उनको रास्ता कोई दिया नहीं होगा।

हमारी रोशनी से दूर क्यों उनकी गली अब तक,
किसी ने दर्द को उनके कभी समझा नहीं होगा।।।

- राकेश कुमार तिवारी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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