फिर आज गालों पर बूदें गिरी हैं
संग अपने वो परानी यादें लाई हैं।
आसमाँ से गिरा है पानी ऐसे
जैसे सदियों की छौपी बातें याद आई है।
वो कागज की नाव और भोला बचपन
मिट्टी की खुशबू से महकता था आंगन
दूर आसमान में दिखता वो इंद्रधनुष
याद आ गया दृश्य वो मनभावन।
भीगी सी गलियां, भीगा सा शहर
उनकी यादों से अब भीगा है मन
हर बूंद में छुपा है,बीता हआ कल
जब बूँद आकर छूती है मेरा तन।
बूंदों से बिखरते हैं बीते हुए लम्हे
आँखों में छलक जाते हैं सारे ख्वाब
बरसात तो बस एक बहाना है
जब याद आती है जीवन की किताब।
पायल शर्मा (जयपुर)
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