धक धक दिल धड़क उठा ममता जी का सिंहासन हिला।
राम नाम की इस सूनामी में ममता दीदी का किला ढहा।।
राजनीति में अंधा होकर उचित अनुचित जो भूल जाये।
होता है पतन फिर उसका नया पुराना सब फिर डूब जाये।।
यह ममता दीदी की हार नहीं उनकी नीति ने उनको मारा है।
होते अत्याचारों के शाप ने ही ममता का सिंहासन उजाड़ा है।।
जैसी करनी वैसी भरनी ठीक इस धरा पर दिख जाती है,
अच्छाई या बुराई की तराजू सही सही सब तौल जाती है।।
यह बीजेपी की जीत नहीं यह जनता की क्रोधाग्नि दिखती है।
इन नेताओं की कथनी और करनी अब तराजू में तुलती है।।
यदि न होते अत्याचार बंग धरा पर तो ममता को हराना आसान न था।
बंग की धरती का ग़ुस्सा बढ़ा तो जनता को फुसलाना आसान न था।।
राज सिंहासन रह न सके यहां जनता नेताओं को खुशी से चुनती है।
यदि जनता को जो खुशी दे न सके तो वही उठाकर धुनती है।।
बंग की धरती से सबक लो अरे ओ मतवाले सत्ताधीशों।
जिस जनता ने तुम्हें ताज पहनाया उसका बूंद बूंद रक्त मत चूसो।।
-चन्द्रशेखर मार्कंडेय
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