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बात कुछ थी ही नहीं

                
                                                         
                            धोखे की कोई बात नहीं थी,
                                                                 
                            
मगर न जाने क्यों दिल में एक बात थी।
शायद कोई वजह भी नहीं थी,
बस यही वजह थी कि कोई वजह नहीं थी।

हम नाराज़ थे उनसे फिर भी,
हालाँकि वो हमसे अनजान नहीं थे।
वो पूछते रहे—“आख़िर ख़ता क्या है?”
और हम सोचते रहे,
कि कोई ख़ता थी ही नहीं।

दिल में एक अजीब-सी शिकवा-ए-ख़ामोशी थी,
आँखों में कुछ अनकहे सवाल थे।
वो सामने थे, फिर भी दूर लगते थे,
शायद यही फ़ासले का मलाल था।

क्या बात थी, कैसी बात थी,
ये बात किसी को मालूम नहीं।
किस बात पर हम ख़फ़ा थे उनसे,
इस राज़ से हम भी वाक़िफ़ नहीं।

वो पूछते रहे—“तुम नाराज़ क्यों हो?”
और हम हर बार ख़ामोश रहे।
शायद अल्फ़ाज़ों में कहने को
कोई बात थी ही नहीं।

बस दिल में एक एहसास था,
जिसकी कोई तफ़्सीर नहीं थी।
बस एक बात थी…
और वो भी शायद यही थी—
कि कोई बात थी ही नहीं।
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54 मिनट पहले

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