अस्पताल की खिड़की
कमरे में
दवाओं की गंध है।
मशीनें
हर धड़कन का
हिसाब रखती हैं।
और सामने—
अस्पताल की खिड़की है।
उसके उस पार
सड़क भाग रही है।
लोग दफ़्तर जा रहे हैं,
बच्चे स्कूल,
सब्ज़ी वाला
आवाज़ लगा रहा है।
दुनिया को
शायद पता भी नहीं—
इस शीशे के पीछे
कोई एक साँस के लिए
पूरी दुनिया माँग रहा है।
खिड़की से
आधा आकाश दिखता है।
पर आज
वही आधा आकाश
मुझे पूरा लगता है।
एक पेड़ की डाल
काँच तक झुकी है।
उस पर बैठी चिड़िया
बिना जाँच कराए
गा रही है।
मैं उसे देखता हूँ
और पहली बार समझता हूँ—
स्वतंत्रता
किसी बड़े मैदान का नाम नहीं,
अपने पैरों से
दो कदम चल पाने का सुख है।
सामने की छत पर
कपड़े सूख रहे हैं।
हवा उन्हें
बार-बार छूती है।
मुझे याद आता है—
घर की छत,
माँ की साड़ी,
पिता का कुरता,
बच्चों की छोटी कमीज़ें।
जिन्हें देखकर
मैं कभी रुका नहीं—
आज वे ही दृश्य
जीवन जैसे लगते हैं।
नर्स आती है,
दवा देती है,
पूछती है—
“दर्द अब कैसा है?”
मैं मुसकराकर कहता हूँ—
“कम है।”
वह नहीं जानती—
दर्द देह में कम,
मन में अधिक है।
मेरे बिस्तर के पास
फल रखे हैं,
फूल रखे हैं,
ढेरों शुभकामनाएँ हैं—
पर सबसे अधिक
वह खाली कुर्सी दिखती है
जिस पर कोई अपना
बैठा करता था।
कल बगल वाले बिस्तर पर
एक बूढ़ा था।
हर सुबह
खिड़की खुलवाता
और धूप से कहता—
“थोड़ी देर
मेरे पास बैठ जा।”
आज उसका बिस्तर
खाली है।
चादर बदल दी गई है,
नाम हटा दिया गया है—
केवल खिड़की जानती है
कि कल यहाँ
कौन था।
काँच पर
बारिश की बूँदें आती हैं।
कुछ देर ठहरती हैं,
फिर नीचे बह जाती हैं।
शायद आँसू भी
ऐसे ही होते हैं—
लोग चेहरा पोंछ देते हैं,
पर भीतर का मौसम
कहाँ बदलता है?
डॉक्टर कहते हैं—
“रिपोर्ट पहले से बेहतर है।”
पर मैं
खिड़की के बाहर खिले
एक छोटे फूल से
पूछता हूँ—
“क्या मैं अगला वसंत
तुम्हारे साथ देखूँगा?”
फूल कुछ नहीं कहता।
हवा आती है
और उसकी गर्दन
‘हाँ’ में हिला देती है।
कभी-कभी
सूरज की एक किरण
मेरे तकिए पर उतरती है।
मैं हथेली फैलाकर
उसे पकड़ना चाहता हूँ—
तभी समझ आता है,
जीवन को बाँहों में नहीं,
विश्वास में
थामा जाता है।
इस कमरे में
सब कुछ सफ़ेद है—
दीवारें,
चादर,
दवाएँ
और डॉक्टर का कोट।
केवल खिड़की
रंग लेकर आती है—
नीला आकाश,
हरी पत्तियाँ,
पीली धूप
और लौटने की उम्मीद।
आज छुट्टी की
ख़बर मिली है।
घर वाले प्रसन्न हैं,
मैं भी हूँ।
पर जाने से पहले
मैं खिड़की के पास
कुछ पल रुकता हूँ।
काँच छूकर कहता हूँ—
“तुमने बाहर की दुनिया
नहीं दिखाई,
तुमने मुझे
जीवन की कीमत
दिखाई है।”
अस्पताल से निकलते हुए
मेरे कदम धीमे हैं—
पर पहली बार
मैं जल्दी में नहीं हूँ।
अब रास्ते का पेड़,
हवा का स्पर्श,
बच्चे की हँसी,
घर का दरवाज़ा—
कुछ भी साधारण नहीं।
अस्पताल की खिड़की
वहीं रह गई है,
पर उससे दिखाई दिया जीवन
मेरे साथ
घर लौट आया है॥
— संतोष कुमार शर्मा
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