आज फिर एक रिश्ता सूली चढ़ा
जिसकी वजह मां बनी।
विवाह तो देख कर ही हुआ
फिर हर रोज कमियां निकली।
पहले रंग से शुरू हुआ फिर
बात लंबाई और अच्छाई पर आई।
जिसे लोग गुलाब से आंकते थे
वो अब लाश का फूल कहलाई।
बात बहुत सरल थे जिसके
वो अब चतुर सियार कहलाई।
जहां सवारना फितरत थी उसकी
अब वो गृहभेदक कहलाई।
सादगी पहचान थी जिसकी
श्रृंगार हुनर था उसका
अब वो आकिंचन कहलाई।
अब आप ही बताओ ऐसी
बहु कहां से आए ?
जो सास के मन भाये।
और ऐसी सास तो धन्य है
जो बेटा प्रहलाद सा पाई।
पर उस बहु का क्या जिसने
बस अपने अरमानों की अर्थी उठाई।
-नेहा राज
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