रोक कृष्ण ने काल चक्र को
किया अर्जुन को प्रेरित अविश्वास,
ना सोच हे, पार्थ ये प्रिय जन हैं,
जो समक्ष खड़ा वो प्रतिद्वन्दि।
सैकड़ों कौरव की भीड़ों में
ना एक मिला तुझे प्रिय अपना,
जो खड़ा आज रणभूमि में
वो कहाँ भला रह गया अपना।
करने दो कर्म इन बाणों को
सहने दो अविरल तापों को,
जो चढ़ा बाण प्रत्यंचा पर
करने दो वारित प्रहारों को।
ना भूलो पार्थ ये वही भ्राता हैं,
जिन्होंने ना रखी कुल की लाज,
कर द्रौपदी का चीर-हरण
खड़े समक्ष तेरे निश्चल ये आज।
5.खड़े समक्ष तेरे वो भी
जिनको प्राणों से भी प्रिय माना,
द्रोणाचार्य को गुरु बनाया
और भीष्म को पितामह माना।
ना सोचो पार्थ ये प्रिय जन हैं,
तोड़ो मोह के इन जंजीरों को,
खेलो नियती का ये अद्भुत खेल
सोचो केवल है ये एक सपनों सा।
.तुम पांडवों का ही अंश खड़ा है,
बनकर पांडवों का शत्रु आज,
हे पार्थ! कहते किसको तुम अपना
कर्ण भी बना तेरा प्रतिद्वन्दी आज।
.नियती के इस अद्भुत खेल में
तू केवल एक मोहरा है,
उठा धनुष, कर कर्म अपना
ये कुछ दिन का ही कोहरा है।
.ना भ्रम में रहना हे अर्जुन
केवल यह भूमि के अंशों की लड़ाई,
मान, प्रतिष्ठा, धर्म और लाज
ने भी महाभारत की आग जलाई है।
हे पार्थ !
चुभते नहीं सारे काँटे
जो राहों में फैले होते हैं,
कुछ नुकीले काँटे ही
पैरों को जर्जर करते हैं।
बेबस हैं, काँटे बनने पर
गुरु द्रोण और पितामह आज,
पर सत्य तो केवल यह है, कि
सिद्ध कर रहे वो अपने कर्तव्य का काज।
उठो पार्थ करो शंखनाद
तुम्हें धर्म का मार्ग सजाना है,
महाभारत के इस गाथा को रचने
नियती ने तुम्हें उद्घोष बनाया है।
अर्जुन कहते हैं,
हे माधव!
.समर्पित करता हूँ खुद को मैं,
तुम्हारे दिए उपदेशों पर,
संशय रहा ना अब मन में,
चलूँगा तुम्हारे वचन-पथ पर।
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