पौ फटने से पहले ही,
जब पहली किरण ने देहली तक नहीं छुई हो,
उसके पदचाप घर की घड़ी बन जाते है।
जो अलसाई सुबहों का आलस नहीं,
बल्कि चूल्हे की लपटों में
दिन का शंखनाद करती है।
वह सिर्फ एक स्त्री नहीं,
एक समूचा संसार है,
जिसकी ओढ़नी के पल्लू में
पूरा परिवार एक सुरक्षित धनराशि की तरह सिमटा है।
तुलसी की क्यारी से लेकर रसोई के धुएँ तक,
उसकी मौजूदगी ही घर की ऑक्सीजन है।
बर्तन की खनक, कर्तन की लय,
और नूपुर की वह मीठी धुन
जो समय की गति मापती है,
सब कुछ उसके ही साज हैं।
उसे पता है, बुजुर्गों की दवाई का वक्त भी
और बच्चों की भूख का भी।
अन्नपूर्णा बनकर जब वह परोसती है,
तो थाली में प्रेम का स्वाद होता है,
भले ही उसने अपनी भूख को
व्यस्तता के किसी कोने में दबा रखा हो।
उपेक्षाओं की उपेक्षा अच्छे से कर लेती है,
दुखो को चुपचाप सहेज लेती है,
जैसे सीप के भीतर मोती का दर्द पल रहा हो।
पति की आंखों में थकान की कोई लकीर हो,
तो वह रात रात भर जागती है,
उसके दर्द को अपना बनाती है,
और उजाला होने से पहले ही,
फिर से नई ऊर्जा बनकर
आंगन में आ जाती है।
झाड़ू पोछा से करती है दिन की शुरुआत
फिर चूल्हा चौकी, दीप पूजन,
सबकुछ दिन और रात।
सच तो यह है
उसके बिना घर सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा है।
जब कुछ दिनों को पीहर चली जाती है,
तो दालान का सन्नाटा छत फाड़कर गिरने को होता है,
देहली की अपनी एक चीख होती है,
और दीवारों पर चित्र उभरते उसी के,
मुंडेर पर पंछी भी मानो उसे पुकारते हैं।
सर्वगुण संपन्न सब ढूंढते है मगर,
मधुर संबंध घर घर हो अगर
तो वह स्वयं 'संपन्नता' है,
वह ईश्वर की प्रसन्नता है।
जो सुबह की तीक्ष्ण किरणों से लेकर,
निशा की चादर बिछने तक,
हर कदम पर एक ढाल बनकर चलती है।
उसका होना,
एक मधुर लय का बजते रहना है।
अर्धांगिनी होना,
एक समूचे अस्तित्व का
किसी और के जीवन में,
पूरी तरह घुल जाना है।
वह जीवन धारा तरंगिणी,
सुख-दुख में सदा संगिनी,
पग पग प्रीतम हित प्रथम,
आंगन अरविंद अर्धांगिनी।
स्वयं को समर्पित करके
जीवन अर्पित करती है,
वह कुल दर्पण है अर्धांगिनी।
—जितेन्द्र सिंह राणावत
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X