मन के भीतर महायुद्ध है,
जिसका कोई शोर नहीं।
मुस्कानों के इस चेहरे पर,
दिखता किंचित् छोर नहीं।
एक ओर है दीप विवेक का,
एक ओर मोह-अंधकार।
एक ओर अमर सत्य अटल है,
दूजी ओर क्षणिक संसार।
हर निर्णय के चौराहे पर,
दो स्वर मुझमें जाग उठे।
एक कहे—"सब पा ले पहले",
एक कहे—"कुछ त्याग उठे।"
अहंकार पुकारे—"जीत यही है",
अंतर कहे—"संभल, ठहर।"
सत्य बचा तो सब कुछ बचा है,
सत्य गया तो शेष है ज़हर।
मनुष्य का सबसे बड़ा युद्ध,
कभी रणभूमि में नहीं होता।
वह अपनी ही आत्मा के द्वार,
प्रतिदिन मौन लड़ा जाता।
जब-जब भीतर युद्ध जला है,
बाहर उत्सव गाता रहा।
मन के सूने निर्जन वन में,
कोई न दीप जलाता रहा।
जो स्वयं से हार गया,
उसे कोई विजय बचा न सकी।
जो स्वयं को जीत गया,
उसे कोई पराजय झुका न सकी।
अंतरद्वंद्व अभिशाप नहीं,
यह जीवन का तप-अभियान।
इसी अग्नि में ढलकर बनता,
मानव का उज्ज्वल सम्मान।
मन के न्यायालय में,
असत्य कभी ठहरता नहीं।
अंतर की निष्पक्ष तुला पर,
कोई कर्म छिपता नहीं।
संसार जीतकर क्या होगा,
यदि मन ही परवश रह जाए।
मन पर जिसने राज्य किया,
जग उसके चरणों में आए।
मनुष्य का सबसे कठिन सफ़र,
पर्वत पर चढ़ जाना नहीं।
अपने भीतर उतर सके जो,
उससे ऊँचा शिखर नहीं।
अंत में इतना सत्य मिला—
शत्रु कहीं बाहर था ही नहीं।
दर्पण ही रणभूमि निकला,
विजय स्वयं से बढ़कर नहीं।
स्वयं को जिसने जीत लिया,
उसने जग का सार लिया।
अंतरद्वंद्व की अग्नि में तपकर,
जीवन का अमृत पार लिया।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित 'भुवन'
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