कहाँ अपने लिए
नारी के मन की अनकही व्यथा
हर एक दर्द को हँसकर सहा, कहाँ अपने लिए,
वो जीती ही रही सबके लिए, कहाँ अपने लिए।
किसी की थाली में रोटी, किसी के ख़्वाब सजाती है,
वो अपना ख़्वाब कब रखती है, कहाँ अपने लिए।
सुबह से शाम तक रिश्तों की ज़िम्मेदारी उठाती है,
मगर दो पल भी बैठी क्या, कहाँ अपने लिए।
कभी बेटी, कभी पत्नी, कभी माँ बनकर जीती है,
वो औरत कब बनी आखिर, कहाँ अपने लिए।
सबकी आँखों में खुशियाँ हों, यही दुआ रहती है,
मगर आँसू कहाँ रखती है, कहाँ अपने लिए।
वो घर को घर बनाने में उम्र सारी बिता देती है,
कभी अपने मन का घर बसाया क्या, कहाँ अपने लिए।
उसकी हथेली की लकीरों में सबके नाम लिखे हैं,
कोई लकीर उसके नाम की भी थी क्या, कहाँ अपने लिए।
उसे पूछो तो बस इतना कहेगी मुस्कुराकर—
“मेरे हिस्से में सब हैं...
मैं कहाँ अपने लिए।”
जिसने सबको दिया अपना हिस्सा, वो खाली हाथ रह गई,
सबकी ज़िंदगी सँवारते-सँवारते,
वो खुद से ही बेख़बर रह गई।
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