आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अनकहा मौसम

                
                                                         
                            सब अपनी-अपनी दिशा में अब बढ़ते जा रहे हैं,
                                                                 
                            
कोई धूप-सा तेज़, कोई छाँव-सा धीरे चल रहा है।
किसी के पाँव में मंज़िल की जल्दी है,
किसी ने सफ़र को ही अपना घर मान लिया।
जो आगे निकल जाए, उसे देखकर मत जलना,
जो पीछे रह जाए, उसे देखकर मत हँसना।
हर व्यक्ति अपनी अदृश्य लड़ाई लड़ रहा है,
हर चेहरे के पीछे एक अनकहा मौसम है,
राह में मिले तो बस दुआ- सलाम कर लिया करना।
-आलोक प्रकाश
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर