आई थी इस अनजाने शहर में
बहुत सारे सपने लेकर,
आज जो जा रही हूँ वापस
तो जा रही हूँ यादें लेकर।
आने से पहले सोचा था,
कैसे रहूँगी, क्या करूँगी,
दोस्त भी बनेंगे मेरे
या फिर अकेली रहूँगी?
पर अब जब जा रही हूँ यहाँ से,
तो हैं वही ढेर सारी यादें,
याद है कैसे आई थी मैं
पहले दिन इस शहर में।
आज जब जाने को आई हूँ,
तो शायद यही बातें याद रहेंगी,
जो कभी अनजान था मेरे लिए,
वही शहर अपनी-सी यादें बनकर रहेगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X