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अंगद का पाँव

                
                                                         
                            जब अंगद दरबार में आया।
                                                                 
                            
एक अकेला रामदूत था,
जिसने रावण को समझाया।

मुट्ठी भर साहस ने उस दिन,
दस शीशों का दर्प झुकाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

बालि-पुत्र, पर तेज निराला,
माता तारा का मान बढ़ाया।
पिता-वियोग की पीड़ा सहकर,
मन में कोई बैर न लाया।

सुग्रीव-संग निष्ठा रखकर,
राम-काज को शीश नवाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

सागर तट तक खोज चली थी,
अंगद आगे बढ़ते जाते।
भूख-प्यास के संकट आए,
वीर न पीछे पाँव हटाते।

संपाती ने सीता-सुधि दी,
दल ने फिर विश्वास जगाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

अंगद बोले—पार उतरना,
मुझको कठिन नहीं लगता है।
लौट सकूँगा या न लौटूँ,
यही प्रश्न मन में जगता है।

अपना बल और अपनी सीमा,
वीर हृदय ने सच बतलाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

युद्ध न हो, यह राम की इच्छा,
शांति-संदेश पहुँचाना था।
सत्य कहे जो निर्भय होकर,
रावण को पथ दिखलाना था।

राम ने सबमें अंगद को ही,
इस गौरव के योग्य बनाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

भरी सभा में अंगद बोले,
सीता को आदर से लौटाओ।
अब भी समय, छोड़ दो हठ को,
राम-चरण में शीश झुकाओ।

घमंड भरा था रावण मन में,
सत्य उसे कब रास आया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

रावण बोला—साथ निभाओ,
किष्किंधा का राज दिलाऊँ।
पिता-वध का बदला ले लो,
स्वर्ण-मुकुट सिर पर पहनाऊँ।

अंगद ने हर लोभ ठुकराकर,
राम-नाम का मान बढ़ाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

अंगद बोले—पाँव हटा दो,
राम बिना रण लौट जाएँगे।
लंका के बलवान सभी यदि,
इसको तनिक डिगा पाएँगे।

एक-एक कर वीर थके पर,
पग को कोई हिला न पाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

रावण स्वयं उठा आसन से,
अंगद का वह पाँव हटाने।
अंगद झट से पग खींच बोले,
लगे उसे फिर राह दिखाने।

मेरा पग मत थामो रावण,
राम-चरण थामो—बतलाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

दूत-धर्म पूरा कर लौटे,
राम को सारा हाल सुनाया।
रण छिड़ा तो वज्र बने वे,
शत्रु-दल को मार भगाया।

नीति और पराक्रम दोनों,
अंगद ने करके दिखलाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥

आज कहीं अन्याय खड़ा हो,
अंगद-सा विश्वास जगाओ।
लोभ, दबाव और भय के आगे,
सत्य का अपना पाँव टिकाओ।

दृढ़ संकल्प जहाँ भी जागा,
असंभव को संभव बनाया।
रामदूत ने जब पाँव जमाया,
लंका का अभिमान हिलाया॥
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एक महीने पहले

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