अकेला बैठा व्यक्ति अकेला नहीं बैठता,
उसके साथ बैठती हैं वो तमाम उलझनें,
जिनमें वो फँसा हुआ होता है।
उसके साथ बैठती हैं वो सारी चिंताएँ,
जिनमें वो डूबा हुआ होता है।
उसके साथ बैठती हैं उन सबकी यादें,
जिन्हें वो बार-बार सोचता रहता है।
उसके साथ बैठते हैं वो सारे ख़्वाब,
जो अब तक अधूरे हैं।
उसके साथ बैठते हैं बेरोजगारी के बोझ,
और बहुत सारी जिम्मेदारीया जो अंदर ही अंदर ,
उसे खोखला बना देती हैं ।
और अंत में, उसके साथ बैठता है
वो अकेलापन,
जिसने उसे सबसे अलग कर दिया।
-चंद्र प्रकाश
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