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मैं तो बचपन से, तेरी ही परछाई थी!

                
                                                         
                            माँ! शोकातुर हो क्यों तेरे नैनों में नमी सी आयी थी?
                                                                 
                            
मैं तो लड़ी थी अपने लिए, जब कर जतन और तप, मैं थक गयी थी।

क्यों भूल गयी तू, मैं कभी पहले तेरी ही परछाई थी।

अडिग रही, चुप्पी साधी, मेरी वाणी हमेशा मीठी ही कहलायी थी!

और, कहाँ डरी थी लक्ष्मीबाई, जब झाँसी पे बात आयी थी?
तो क्यों मैं चुप्पी साध के बैठूँ, जब बात मेरे बच्चों पे आयी थी?

माँ दुर्गा भी तो आपातकाल में, अपने प्रचंड रूप में आयी थी;

फिर क्यों शोक है हो माता, जब अपने लिए मैंने लड़ी ये लड़ाई थी?

तू भूल गयी क्यों बचपन से ही शीतल मेरी काया थी।

माँ! भूल गयी क्यों बचपन में मैं कहलायी, तेरी ही परछाई थी!

फिर क्यों शोकातुर हो, नैनों में तू नमी सी लायी थी?

मैं तो बचपन से, तेरी ही परछाई थी!
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एक घंटा पहले

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