वो बहुत दिनों कि अलसाई त्यागी हुई ,गई ठुकराई
जब बहुत दिनों से संभली थी ,बहुत दिनों से मुस्काई
वो देख रहा था बन पुरुष, औरत कि यह जीत अजब खुद कि स्त्री में देख लिया, उसने आज सौन्दर्य गजब
स्वयं चलकर गई नहीं, पर वंचित मिलन से रही नहीं
समर्पित हो सब पीड़ा भूली, स्मृति पिछली रही नहीं
लिया उसने बांह समेट, जैसे किया कोई आखेट
देह वह घायल कर चुका, मन क्रूरता से भर चुका
बोले उसने फिर वो बोल ,पछताई वो आंचल खोल
कहता रहा अनर्गल बात ,बैठी रही वो फिर भी साथ
याद आई सब गुजरी रात ,देह से दुना मन पर आघात
रोया मन एक शिशु समान, माता ज्यों गई श्मशान
कुछ क्षण पहले उसे बताया, महत्व उसका उसे जताया
न रह सकूंगी जीवित मेरे प्राण, मुझसे जो हुए अंजान
जीत चुका वो अपने मन में ,कहा- जरा देखो दर्पण में मुझे नहीं है रूचि तुम में, फिर क्या ही रखा तेरे अर्पण में
-मीनाक्षी मीना
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