*आओ भीतर राम जगाएँ*
रामबाण ने प्राण हरे थे,
दंभ विनाश बुला लाया।
जिसने जग को जीतना चाहा,
ख़ुद को जीत नहीं पाया।
परनारी को हर ले आया,
नारी का सम्मान भुलाया।
सीता की दृढ़ निष्ठा के आगे,
उसका वैभव काम न आया।
नारी की गरिमा समझें हम,
उसकी इच्छा का मान निभाएँ।
मन का रावण मिटे हमारा,
आओ, भीतर राम जगाएँ।
हक़ छीनकर महल उठाएँ,
फिर भी चैन कहाँ पाते हैं।
जिनकी आहें दबा रहे हों,
उनसे नज़र चुरा जाते हैं।
वाणी के तीखे तीरों से,
कितने अपने दूर हुए।
जीत गए हम बहस मगर फिर,
रिश्ते चकनाचूर हुए।
क्रोध उठे तो पहले ठहरें,
फिर अपनी बात समझाएँ।
मन का रावण मिटे हमारा,
आओ, भीतर राम जगाएँ।
पुतले तो हर साल जलाए,
मन का दंभ कहाँ जलता है।
जब तक अपनी भूल न मानें,
भीतर रावण ही पलता है।
जिनका हक़ दबाया हमने,
पहले उनका हक़ लौटाएँ।
अपने सुख की सीमा से अब,
दुखियों तक भी हाथ बढ़ाएँ।
रावण केवल नाम न समझें,
उसकी हर आदत ठुकराएँ।
मन का रावण मिटे हमारा,
आओ, भीतर राम जगाएँ।
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X