खिल गई रंगत उसे गुल-आब कहते हैं,
आँख की मासूमियत को ख़्वाब कहते हैं।
दूर तक जाने का इक ज़रिया नज़र आता,
आप जिसको राह का गिरदाब कहते हैं।
आपकी नज़रें कहें चाहे पशेमानी,
झुक गया सिर हम उसे आदाब कहते हैं।
दिलरुबा जब साथ होती हाथ को थामे,
उन सभी लम्हों को हम शादाब कहते हैं।
ख़ाकसारी पर मेरी हँसता रहे कोई,
क़ीमती हूँ मैं बहुत अहबाब कहते हैं।
ज़ुल्म की दीवार ठोकर से गिराएँगे,
बाँध तोड़ेंगे यही सैलाब कहते हैं।
आफ़ताबी रंग धुँधला 'अब्र' है लेकिन,
रोशनी देंगे यही महताब कहते हैं।
-अब्र लखनवी
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