ग़र ये बात हुई आख़िरी, तो क्या करोगे तुम,
मुलाक़ात रही अधूरी, तो क्या करोगे तुम।
आज वक़्त नहीं तुम्हारे पास एक पल का,
जनाज़े में दो पल आकर भी क्या करोगे तुम।
यूँ रूठे हो बेवजह आज मुझसे तुम,
कल न रहूँ, तो मनाकर भी क्या करोगे तुम।
आज वक़्त को समेट लो अपनी मुट्ठियों में,
बीते लम्हों का तकाज़ा भी क्या करोगे तुम।
जो कहना है, अभी कह दो, ख़ामोशी छोड़ो,
लबों पर बात रखकर भी क्या करोगे तुम।
ये साँसें हैं अमानत, कब लौट जाएँ कौन जाने,
उम्र भर अश्क़ बहाकर भी क्या करोगे तुम।
मोहब्बत की किताबों में हिसाब नहीं होते,
दिलों का क़र्ज़ चुका कर भी क्या करोगे तुम।
'पिन्टू' ज़िंदगी हर रोज़ मौहलत तो नहीं देती, ।
एक दिन के नाम का भी, क्या करोगे तुम ।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X