आज से कुछ साल बाद
बंद हो जाएगा मिलना पीने के लिए शुद्ध पानी भी,
क्योंकि पानी की बर्बादी इस काल में बहुत हुई।
बोतल में जो मिल रहा, फिर मिलेगा ग्लूकोज में,
सोच लो, यह विनाश की कहानी अब शुरू हुई।
वैसे तो हवा पहले भी शुद्ध नहीं है शहरों में,
इतनी जहरीली गैसों की रोज़ मिलावट हो रही।
जिस रफ्तार से आजकल पेड़ काटे जा रहे,
ऑक्सीजन सिलेंडर खरीद लो, अगर साँसों की चाह रही।
ढूँढने से भी नहीं मिलेगा एक स्वस्थ इंसान भी,
फल, सब्जियाँ और रोटी इतनी जहरीली हुई।
बंद हो जाएँगी फसलें भी अब उगनी धरती पर,
क्योंकि कीटनाशक दवाइयों की मिट्टी में भरमार हुई।
प्राकृतिक संसाधन और जंगल जिस तरह लूटे जा रहे,
सुखाई जाएगी रोटी धूप में, वह दिन भी दूर नहीं।
शेर, हाथी भी रह जाएँगे सिर्फ कहानियाँ बच्चों की,
जब से हमने सुना है, कई प्रजातियाँ ऐसे लुप्त हुईं।
नहीं मिलेगी मछलियाँ कच्ची भी खाने को,
जिस गति से समुद्र में गंदगी फैल रही।
कितने जानवरों का बसेरा उजाड़ दिया है तुमने,
ना समुद्र का पानी छोड़ा, ना जंगलों की छाया बची।
एक दिन होंगे कीड़े-मकोड़ों की तरह ही मनुष्य,
क्योंकि जनसंख्या नियंत्रण पर नहीं अभी कोई बात हुई।
कौन कुचलकर चला गया और कौन नोचकर खा रहा,
बात जहाँ से शुरू हुई थी, ना बात वहाँ पर खत्म हुई।
बचाने को निकली है अब कुदरत भी अपने अंश को,
फिर कहते हो, यह बाढ़, भूकंप जैसी आपदा कैसे आ गई?
क्यों बाज़ नहीं आ रहे हो अपनी हरकतों से तुम,
फिर कहोगे, क्यों धरती ही इंसानों को खा गई?
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