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वक्त का पाबंद

                
                                                         
                            प्रेम परिस्थितियों का गुलाम नही होता।
                                                                 
                            
ऋतु का बंदी वक्त का पाबंद नही होता।।

हिमालय जैसी ऊँचाई पाताल सी गहराई।
संसार के निर्णयों का प्रेम आदी नही होता।।

स्त्री जब अपना माथा उसके वक्ष पर रखे।
सदियों से भटकती भागीरथी को गर्व होता।।

जहाँ वेग भी सुरक्षित है और समर्पण भी।
उनके बीच का प्रणय कोई विषय नही होता।।

न देह प्रेम की गवाही और न शब्द 'उपदेश'।
केवल आँखें समझे मौन को भ्रम नही होता।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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2 महीने पहले

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