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तुम्हारी नफरत

                
                                                         
                            मौका निकाल कर मेरा वज़ूद मिटा देता।
                                                                 
                            
ख्वाब उजाड़ कर तुम्हें सुकून कौन देता।।

तुम्हारी नफरत का सलीका बेहतरीन रहा।
ये हाथ छुड़ाने का हौसला तुम्हें कौन देता।।

सफर के बीच बेगुनाह को गुनाहगार कहा।
जज्बातों से खेलने का मशविरा कौन देता।।

इन सबके बावजूद तुम्हारी याद क्यों आती।
मैं न होती 'उपदेश' तुम्हे आसरा कौन देता।।

मोहब्बत करने का फैसला तुम्हारा ही था।
अगर मैं नही करती तो सहयोग कौन देता।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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3 महीने पहले

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