थोड़ी सी उम्मीद में जिये हम।
कदम बढ़ाने के हौसलों में दम।।
वो रास्ते से ही हट गए होंगे।
उनकी दीवारों में नही था दम।।
तपिश फ़िजाओ में बढ़ गई।
तब पानी बरसा फिर आई दम।।
शराब जैसी तल्ख़ यादो में बैठे।
तन्हाई चीखती नशेड़ी है बे-दम।।
अपनी तमन्ना अधूरी पड़ी थी।
सुलझी उल्फत ने निकाली दम।।
बहारों में भीगे किनारे 'उपदेश'।
कदमों को छूकर फिर आई दम।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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