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सुनसान जिन्दगी

                
                                                         
                            तेरे वज़ूद की नीव में मजबूती का काम ही नही।
                                                                 
                            
इमारत कब तक टिकेगी ठहरने का नाम ही नही।।

बदलाव फितरत ज़माने की देरी से पहचान पाई।
इश्क़ का निचोड़ आँसू के सिवाय अंजाम ही नही।।

मुकम्मल सफर सोचकर साथ पकड़ा था तुम्हारा।
मगर दिल के शहर में हमारा कोई आदम ही नही।।

रूह फिर भी अमानत हैं तेरी 'उपदेश' क़ुसूर क्या।
जिस्म तड़पता छोड़ दिया राह में जानम ही नही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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