आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सुकून भरी जिंदगी

                
                                                         
                            समझ आता तो रिश्ता बनाते ही क्यों।
                                                                 
                            
सरल जिंदगी को और उलझाते ही क्यों।।

खुशी से हामी भर दी ख्वाबों में डूबकर।
गाँव को छोड़ उनके शहर आते ही क्यों।।

उम्मीदों के मेले में एहसास के बुलबुले।
यों मिल जाते तो तकलीफ़ उठाते ही क्यों।।

हकीकत से वाकिफ होते ही ओले गिरे।
मालूम होता तो रिश्ते आजमाते ही क्यों।।

सुन रखा था बहुत कुछ 'उपदेश' काम के।
सुकून भरी जिन्दगी में दर्द आते ही क्यों।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर