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शहर खामोश

                
                                                         
                            अश्क पलकों में दबाये उम्मीद के खातिर।
                                                                 
                            
कभी निभाएगा वो भी वैसे है बड़ा शातिर।।

शहर खामोश दिखा तन्हाई चीखती रही।
यादे ओढ़कर सोई रही उम्मीद के खातिर।।

दाँव पर लगाकर जिंदगी राह देखती रही।
हारने का डर खो दिया उम्मीद के खातिर।।

काँच के ख्वाब सँभालने में रात जाती रही।
प्यार की आस सुबकती उम्मीद के खातिर।।

जिंदगी जिसके नाम वही जिद्द पर कायम।
सहारे की दुम नही छोड़ी उम्मीद के खातिर।।

वक्त का इशारा न मिला 'उपदेश' उजाले में।
तजुर्बा खारा चखा मैंने उम्मीद के खातिर।।

- उपदेश कुमार शाक्या
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2 महीने पहले

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