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सतरंगी ख्वाब

                
                                                         
                            जब तुम मिली नये-नये एहसास मिले।
                                                                 
                            
हाथ में हाथ आया सतरंगी ख्वाब मिले।।

आँखें देखती रह गई क़यामत तक उसे।
मेरी आँखों की तरह उसे भी सुकून मिले।।

कितनी उलझनें दिमाग़ में आकर सुलझी।
हल तुम्हीं ने निकाला तुम्हें भी प्यार मिले।।

वो झूठे जो कहते मोहब्बत मुकम्मल नही।
महिलाये अगर चाहे तो उन्हें क्या न मिले।।

सामाजिक डर से परेशान 'उपदेश' दिखे।
बेचैनी हद से ज्यादा बढ़े तो बस मौत मिले।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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