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समझदारी

                
                                                         
                            अपनों की चोट सहकर खड़ी हूँ।
                                                                 
                            
चाह कर भी उनसे नही लड़ी हूँ।।

कभी हाथ थामा कभी थमाया।
अपनों के कारनामों से बड़ी हूँ।।

अजीब सा हिसाब इन रिश्तों का।
जो मिला लिया तर्क से भिड़ी हूँ।।

कुछ ने अपनाया कुछ ने जलाया।
मैं समझदारी से डटकर खड़ी हूँ।।

खुद को समझा कर निभाया मैंने।
मगर अपनी इज़्ज़त की कड़ी हूँ।।

मनमानी चलने नही दी किसी की।
चट्टान की तरह 'उपदेश' अड़ी हूँ।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
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3 महीने पहले

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