सूनेपन की दीवार जरा गिरा कर देखती।
खामोश लब बोलते उन्हीं से पहल चाहती।।
हवा का दौर है इससे बच कर रहना था।
लग जाने पर ख्वाब में साही दखल चाहती।।
तुम आई चिडियों की तरह चहचहाती हुई।
आँधी बिगाड़ ना सकी चहल-पहल चाहती।।
सँभालने का तरीका है रुआबदार तेरा भी।
झिझक आती नही 'उपदेश' हलचल चाहती।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
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