आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सब्र के घूंट

                
                                                         
                            सब्र के घूंट 'उपदेश' दवाई की तरह ले रहा।
                                                                 
                            
बिछुड़ी मोहब्बत को लिखकर इशारा दे रहा।।

तबियत मचलती मगर कुछ कर नही सकता।
हर वक्त मोहब्बत को यादो का सहारा दे रहा।।

जितने दिन और रात बिताए निशानियाँ अपनी।
जिन्दा रहेंगे जब तक संवरने का गुजारा दे रहा।।

जिन्दगी में मोहब्बत आती फिर छुपकर रहती।
बदनामी के डर से मोहब्बत को किनारा दे रहा।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
40 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर