आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पेड़ के नीचे पढ़ना

                
                                                         
                            खेतों में खेलना पेड़ के नीचे पढ़ना।
                                                                 
                            
भेस चराकर संध्या से पहले लौटना।।

बचपन सुनहरा अपना खो गया जैसे।
यादो के ठहराव में रह रहकर हँसना।।

बीते पल न लौटेंगे गाँव के मंजर मेरे।
बारिश में भीगा घर का आँगन पुराना।।

वक्त की रेत फिसली पकड़ ना पाया।
नये आयाम ने छू लिया नया ठिकाना।।

आज पलट कर देखती कहाँ आ गई।
सीख लिया घाट घाट का पानी पीना।।

रास्ते बदले जीवन राह नई पाई 'उपदेश'।
अपनी शख्सियत सलाम करता ज़माना।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर